Hindi Poems

सीढ़ियाँ
इंतज़ार की घड़ियों को गिनते गिनते कितना वक्त निकल जाता है इसकी कल्पना भी बहुत मुश्किल है| इंतज़ार की फितरत ही होती है और रुकने की, थोडा और ठहरने की, थोडा और इंतज़ार कराने की|

माँ
एक कविता माँ के नाम| आज जब उनकी आँचल की छाँव से दूर हैं तो हमने क्या खोया है, इसपर एक विचार|

चड्डी-मैन
एक मसीहा की कहानी|

स्वागत की लागत
दशहरा के पावन अवसर पर यह कविता इसी बात को दुहराती है की युग चाहे कोई भी हो, रावण चाहे कितने ही विशाल क्यों ना हो जायें, अंत में जीत राम की ही होती है| एक प्रकार से यह आज के हिंदुस्तान पर व्यंग्य भी है, और आज के हमारे नेताओं पर एक कटाक्ष भी| हमें अपने भूत से सीखना तो चाहिए, पर क्या हम अपनी असल जिंदगी में सीख पाते हैं? सीखना कितना कठिन काम है? आखिर एक बदलाव का स्वागत करने में कितनी लागत होती है?

राख
अगर आपने कभी इस बात पर हल्का सा भी सोचा है की आखिर लोग सिगरेट क्यूँ पीते हैं तो यह कविता आपके लिए है|

चस्मुद्दीन
एक हल्का-फुल्का व्यंग्य आज के विद्यार्थियों पर और उनकी भेड़-चाल की फितरत पर|

आज मैंने एक दिया जलाया
एक कृति जो मुझे बनारस से जोड़ती है| बनारस के घाटों पर आपको यह चित्र बड़े आराम से दिखेगा, और हो सकता है आपको सोचने पर मजबूर भी करे जिस तरह इसने मुझे किया है|

तू चलता जा
यह कविता उन पलों के लिए है जब आप स्वयं को असहाय और निराश महसूस करते हैं| इस कविता ने मुझे बहुत प्रेरणा दी है और हमेशा आगे बढ़ने के लिए प्रेरित किया है| आशा है की आपको भी मेरी यह रचना अच्छी लगेगी|

Advertisements

Say Something About This Post

Fill in your details below or click an icon to log in:

WordPress.com Logo

You are commenting using your WordPress.com account. Log Out / Change )

Twitter picture

You are commenting using your Twitter account. Log Out / Change )

Facebook photo

You are commenting using your Facebook account. Log Out / Change )

Google+ photo

You are commenting using your Google+ account. Log Out / Change )

Connecting to %s