खत


ज़बान पर ताले लटके हुए थे आँखों से झाँक रहे थे आंसू होंठ हो रहे थे सुर्ख सांसें थी बेमानी| धड्कनें कभी तेज तो कभी धीमी चेहरा निस्तेज और उम्मीदें […]

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सीढ़ियाँ


पनघट की सीढ़ियों, के किनारे बैठा रहा, सदियाँ निकलती रहीं, इंतज़ार बढ़ता रहा| वो आती थी पानी भरने, कभी मंद-मंद मुस्काती भी थी, पानी बढ़ता घटता रहा, इंतज़ार बढ़ता रहा| […]

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माँ


पहले कभी जब थक जाते थे, तुम हल्के हाथों से थपथपा कर, कभी हाथ फेर कर चेहरे पर, कभी कहानियाँ सुना कर, किसी धुँधलाते समय की छिपती यादों में लोरियाँ […]

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