सीढ़ियाँ

Stairs

पनघट की सीढ़ियों,
के किनारे बैठा रहा,
सदियाँ निकलती रहीं,
इंतज़ार बढ़ता रहा|

वो आती थी पानी भरने,
कभी मंद-मंद मुस्काती भी थी,
पानी बढ़ता घटता रहा,
इंतज़ार बढ़ता रहा|

एक बार मुस्काती आँखों से देखा था,
लाल पैरों में पायल भी थी,
मैं झंकार सुनता रहा,
इंतज़ार बढ़ता रहा|

दूर पनघट की सीढ़ियों पर भी,
सुनी थी दावतों की शहनाई,
वो फिर कभी आई नहीं,
मैं इंतज़ार करता रहा|

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