स्वागत की लागत

सीख हम बीते युगों से
नए युग का करें स्वागत
पर कौन समझाए लेखक को
सीखने में होती है लागत|

जब हो मुझ खुद को इतना ज्ञान
हों साथ खड़े विद्वान तमाम
सामने सब मंदबुद्धि लगते हैं
चाहे क्यों ना खड़े हों राम|

जब यूँ दिमाग फिर जाता है
मन भी हर्षित हो जाता है
बुद्धि-विवेक मरता नहीं
बस, नेगेटिवली चार्ज्ड हो जाता है|

लाख मना कर ले कोई फिर
बढ़ता जाये शक्ति का मद
दुर्विचार से दुर्व्यवहार तक
हट की नहीं है कोई हद|

ना कोई गिरा सके मुझको
ना कोई झुका सके मुझको
मैं एक ही सर्वज्ञाता हूँ
ना कोई डिगा सके मुझको|

कुलांचे भरते अहंकार से
हर धरा रौंद चलता जाये
अपनी विद्वता को स्वयं
ठोकरें मार-मार बिखरा जाये|

परन्तु हर युग, हर सृष्टि में
स्वयंभू यह भूलता जाता है
की हर रावण का वध करने
फिर राम स्वयं ही आता है|

साम-दाम भी करके देखे
दंडों से उसे डराता है
हर भेद परन्तु रावण से
जाने क्यों छुपता जाता है|

चाहे हो कितना ही ज्ञान
संग हो विद्वान तमाम
कोई बचा ना सकता रावण को
जब क्रोधित हो उठे हों राम|

काश सीख बीते युगों से
नए युग का करते स्वागत
अरे, कोई समझाओ निर्लज्ज कवि को
सीखने में लगती है लागत|

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2 responses to “स्वागत की लागत

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