चस्मुद्दीन

लटकते लटकते पहुँच गए कहाँ हम,
कुछ विश्वास हुआ नहीं,
जब आँख खुली तो चारों ओर,
बस चस्मुद्दीन ही चस्मुद्दीन||

जब गौर से देखा हमने सबको,
तो पाया के काफी लटके थे,
कुछ कूद-कूद कर, फुदक-फुदक कर,
और कुछ थे जबरन धकेले हुए||

जाने कितने ही हर साल,
आते हैं लटकते हुए,
कुछ करते हैं धक्का-मुक्की,
लड़खड़ाते पैरों से रौंदते ज़मीन को||

कुछ खेले, कुछ सीखे, कुछ ने देखे सपने,
कुछ सुलझे, कुछ उलझे,
कुछ समझते रह गए दूसरों को,
और उनके सपनों की पहुँच||

कुछ संभल जाते हैं समय रहते,
और पकड़ते हैं अपनी अलग राह,
और कुछ सोचते, खड़े रह जाते हैं,
चस्मुद्दीन के चस्मुद्दीन||

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